The Natural Environment Essay In Hindi

पर्यावरण प्रदूषण पर निबंध Essay on Environmental Pollution in Hindi

क्या आप हमारे आस-पास होने वाले प्रदुषण के विषय में जानना चाहते हैं?
क्या आप प्रदुषण के स्रोत,  कारण, इसके प्रभाव और इसको समाधान करने के उपायों के बारे में पढना चाहते हैं?
क्या आप हमारे पृथ्वी को बचाने के लिए पर्यावरण के महत्व के विषय में लोगों को जागरूक करना चाहते हो

पर्यावरण प्रदूषण पर निबंध Essay on Environmental Pollution in Hindi

पर्यावरण ही जीवन Environment is Life

पर्यावरण प्रदूषण (Environmental pollution) का अर्थ होता है पर्यावरण का विनाश। यानि की ऐसे माध्यम जिनके कारण हमारा पर्यावरण दूषित होता है। इसका प्रभाव से मनुष्य और प्राकृतिक दुनिया को ना भुगतना पड़े उससे पहले हमें इसके विषय में जानना और समझना होगा।

मुख्य प्रकार के पर्यावरण प्रदूषण हैं – वायु प्रदुषण, जल प्रदुषण, ध्वनि प्रदुषण, ऊष्मीय प्रदूषण, मिट्टी प्रदूषण और प्रकाश प्रदूषण। धीरे-धीरे विश्व की जनसँख्या बढती चहली जा रही है जिसके कारण वनों की कटाई भी जोरो से हो रही है। इन बीते 10-15 वर्षों में वनों की कटाई के कारण, पृथ्वी में कई प्रकार के खतरनाक गैसीय उत्सर्जन हुए हैं।

हम एक ऐसे सुन्दर ग्रह पृथ्वी में रहते हैं जो एक मात्र ऐसा ग्रह है जहाँ पर्यावरण और जीवन है। पर्यावरण को स्वच्छ रखने का एक ही सबसे बेहतरीन तरीके है वो है पानी और वायु को स्वच्छ रखना। पर आज के दिन में मनुष्य इसके विपरीत कर रहा है पानी और वायु को प्रदूषित।

हमें इस बात को समझना होगा कि अगर हम पृथ्वी को बचाना चाहते हैं तो हमें कड़े कदम उठाने होगे जिससे की हमारा पर्यावरण दूषित होने से हम बचा सकें। बिना जल और वायु के पृथ्वी में भी जीवन का अंत हो जायेगा।

पृथ्वी का जीवमंडल कई प्रकार के चीजों का एक मिश्रण है जैसे ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड, आर्गन, और भाप। सभी जीवजंतुओं के जिनके लिए यह सभी चीजें बहुत ही जरूरी हैं इसलिए इन सभी चीजों का संतुलित होना भी बहुत महत्वपूर्ण है।

लेकिन जिस प्रकार मनुष्य प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते चले जा रहा है इसकी आशा बहुत कम दिखाई देती है।

स्रोत और कारण Source and Causes

पर्यावरण प्रदुषण के स्रोत और कारण कुछ इस प्रकार से हैं –

  • आज के मनुष्य को जीवन यापन के लिए कई प्रकार की वस्तुओं की आवश्यकता होती है और दिन बदिन इसकी मांग भी बढती चली जा रही है। जरूरत के कारण कई जगह के पेड़ पौधे काट कर उन जगहों पर कई कारखानों का निर्माण किया जा रहा है। उसके बाद उन कारखानों से 3 प्रकार से प्रदुषण हो रहा है। पहला पेड़ काटने के कारण, दूसरा कारखाना से निकलने वाला ज़हरीला पानी सीधा अन्य बड़े जल स्रोतों से मिल रहा है और दूषित कर रहा है, तीसरा कारखानों से निकलने वाला धुआं जो वायु में मिल कर वायु प्रदुषण को बढ़ावा दे रहा है।
  • लोग कूड़ा को सही तरीके से नष्ट नहीं करते जिसके कारण मिटटी की उर्वरता शक्ति भी ख़त्म हो जाती है।
  • धीरे-धीरे मनुष्य वाहनों पर निर्भर हो चुका है जिसके कारण लाखों-करोड़ों गाड़ियों से निकलने वाला धुआं वायु प्रदुषण का मुख्य कारण बन चूका है। उसके साथ-साथ इन वाहनों से निकलने वाले तेज़ आवाज़ के कारण ध्वनि प्रदुषण भी फैल रहा है।
  • लोगों की बढती जनसँख्या के कारण और गाँव का शहर में बदलने के कारण हरे भरे बृक्षों को काट दिया जा रहा है जो प्रदुषण का एक बहुत बड़ा कारन है।
  • आज कृषि क्षेत्र में भी ज्यादा फसल के लिए किसान कई प्रकार के खतरनाक फ़र्टिलाइज़र और कीटनाशक का इस्तेमाल कर रहे हैं जो मनुष्य का जीवनकाल कम करना का मुख्य कारण है।

प्रभाव और समस्या Impact and problem

पर्यावरण प्रदुषण का पृथ्वी और मनुष्य दोनों पर बहुत ही बुरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। आज ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने और लाभ के लिए मनुष्य विज्ञानं की मदद ले रहा है। परन्तु इस चक्कर में कई प्रकार के हानिकारक रसायन उत्पादों को हम हर दिन खा रहे हैं और हर दिन प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

ना सिर्फ भारत में पुरे विश्व में प्रदुषण का यही हाल है। सबसे बड़ा सवाल बस यही है कि क्या हम सही दिशा में चल रहे हैं? इसका सीधा उत्तर है- बिल कुल नहीं, क्योंकि कोई भी विनाश का रास्ता सही नहीं होता है।

प्रदुषण के कारण कई प्रकार की बीमारियों से पुरे विश्व भर के लोगों को सहना पड़ रहा है। इनमें से कुछ मुख्य बीमारियाँ और स्वास्थ से जुडी असुविधाएं हैं – टाइफाइड, डायरिया, उलटी आना, लीवर में इन्फेक्शन होना, साँस से जुडी दिक्कतें आना, योन शक्ति में कमी आना, थाइरोइड की समस्या, आँखों में जलन, कैंसर, ब्लड प्रेशर, और ध्वनि प्रदुषण के कारण गर्भपात।

जो भी सामान आज के दिन में हम खाते हैं, पीते हैं सब कुछ प्रदुषण की चपेट में आ चूका है। हर चीज दूषित हो चूका है जिसके कारण कई लाइलाज बीमारियां फ़ैल चुकी हैं।

जल को प्रदूषित करने के कारण अब पीने का पानी भी पृथ्वी पर बहुत कम बच गया है। आंकड़ों के अनुसार पृथ्वी पर 71 प्रतिशत जल है परन्तु उसमें से मात्र 1 प्रतिशत पानी ही पीने लायक है। लोगों को कपडे धोने, खाना पकाने और खेती किसानी के लिए भी पानी का देख कर उपयोग करना चाहिए।

ज्यादातर कारखाने ज्यादा आबादी वाले क्षेत्रों में निर्माण किये गए हैं जिसके कारण टी बी, अस्थमा, और ह्रदय से जुडी बीमारियों से लोगों को भुगतना पद रहा है।

भूमि या मिट्टी प्रदुषण के कारण अब भूजल भी भारी मात्रा में दूषित हो चूका है। वैज्ञानिकों का मानना है हम मनुष्य स्वयं के बनाये हुए सामूहिक विनाश के वातावरण में जी रहे हैं।

पर्यावरण प्रदुषण का समाधान Pollution Control

  • जो भी कारखाने बनाये जा चुके हैं उन्हें तो अब हटाया नहीं जा सकता है परन्तु सरकार को आगे बनाये जाने वाले कारखानों को शहर से दूर बनाना चाहिए।
  • ऐसी योजनायें और गाड़ियां बनाना चाहिए जिनसे कम धुआं निकले या वायु प्रदुषण को हम ज्यादा से ज्यादा रोक सकें।
  • जंगलों और पेड़ पौधों की कटाई को किसी भी तरह रोकना चाहिए।
  • नदी के पानी में कचरा फैक कर दूषित करने से लोगों को रोकना चाहिए और नदी के पानी को (सीवेज रीसायकल ट्रीटमेंट) की मदद से स्वच्छ करके पीने के कार्य में लगाना चाहिए।
  • प्लास्टिक का इस्तेमाल बंद कर के रीसायकल होने वाले बैग का इस्तेमाल करना चाहिए। हाला की भारत में कई बड़े शहरों में इसको अनिवार्य कर दिया गया है परन्तु सही तरीके से अभी लागु नहीं हुआ है।

अंत में बस में पुरे विश्व भर के लोगों को बस इतना कहना चाहूँगा कि आप जितना हो सके हमारे पृथ्वी को स्वच्छ रखें, दूषित ना करें।

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स्वास्थ्य और पर्यावरण (Health and Environment)

बढ़ते औद्योगीकरण और उन्नत औद्योगिकी के कारण पृथ्वी के प्राकृतिक वातावरण में व्यवधान उत्पन्न हो गया है। इस व्यवधान ने प्रकृति के स्वाभाविक सामंजस्य को असंतुलित कर दिया है और, चूँकि मानव-जीवन प्रकृति का अभिन्न अंग हैं, इसलिए बढ़ते प्राकृतिक असंतुलन ने इंसान के जीवन को भी असंतुलित कर दिया है। यह तो अविवादित सत्य है कि आज के बढ़ते औद्योगीकरण और तकनीकी विकास ने इंसान को ऐसी अति-आधुनिक सुख-सुविधाएँ प्रदान की हैं, जिनके कारण उसका जीवन अप्रत्याशित रूप से सरल और सहज बन गया है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि बढ़ते औद्योगीकरण और उन्नत औद्योगिकी के कारण पृथ्वी के प्राकृतिक वातावरण में व्यवधान उत्पन्न हो गया है। इस व्यवधान ने प्रकृति के स्वाभाविक सामंजस्य को असंतुलित कर दिया है और, चूँकि मानव-जीवन प्रकृति का अभिन्न अंग हैं, इसलिए बढ़ते प्राकृतिक असंतुलन ने इंसान के जीवन को भी असंतुलित कर दिया है। फलस्वरूप आज का बिगड़ा पर्यावरण मनुष्य के स्वास्थ्य को बहुत ज्यादा प्रभावित कर रहा है।

मनुष्य का स्वास्थ्य निस्संदेह उसकी बड़ी पूंजी है क्योंकि स्वास्थ्य शरीर में ही स्वस्थ विचारों का वास होता है। स्वस्थ विचारों में रचनात्मकता, तीव्रता और तत्परता होती है, और साथ ही कुछ कर गुजरने की इच्छा ही नहीं, क्षमता भी होती हैं। स्वस्थ शरीर में ही खुशहाल मन रहता है, और एक संतुष्ट और खुशहाल मन में ही यह सामर्थ्य होती है कि वह मानव मात्र के लिए सद्भावना रख सके और बिना किसी भेदभाव के स्व्यं अपने, अपने परिवार, देश और समाज के विकास के बारे में विचार कर सके। ऐसे हालातों में कहा जा सकता हैं, कि मनुष्य का अच्छा स्वास्थ्य न केवल उसके अपने लिए बल्कि उसके परिवार, देश और समाज सभी के लिए बहुत अहमियत रखता है। इसलिए मनुष्य के स्वास्थ्य पर पर्यावरण का कुप्रभाव निश्चय ही चिंता का विषय है।

पर्यावरण


पर्यावरण पर चर्चा करते समय सबसे पहले हम इस तथ्य पर विचार करेंगे कि आखिर इस शब्द का तात्पर्य क्या है। आम तौर पर समझा जाता है कि वायु, जल, मिट्टी और पेड़-पौधे मिलकर पर्यावरण बनाते हैं। यह सच तो हैं, किंतु सीमित अर्थों में। व्यापक रूप से हम कह सकते हैं कि मनुष्य के आसपास का सारा वातावरण, घर के भीतर और बाहर, सभी कुछ पर्यावरण का एक हिस्सा है। इसलिए, यदि पानी और हवा का प्रदूषण मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है, तो साथ ही घरों में इस्तेमाल होने वाली बहुत-सी आम चीजें भी हमारे पर्यावरण को दूषित करती हैं।

पर्यावरण और उसके दुष्प्रभाव को मूल रूप से दो भागों में बाँट सकते हैं— बाहरी और भीतरी।

बाहरी प्रदूषण


घर के बाहर हमें अधिकतर पर्यावरण के जिन अंगों का समाना करना पड़ता हैं, वे हैं :

1. वायु
2. जल, और
3. ध्वनि।

पर्यावरण के इन बाहरी भागों, उनसे होने वाले प्रदूषण, उसके कुप्रभाव वगैरह की चर्चा इतनी ज्यादा हो चुकी है कि आमतौर पर आज सभी जानते हैं कि किस तरह ये मानव शरीर को प्रभावित करते हैं।

वायु और स्वास्थ्य


पूरी पृथ्वी में वायु व्याप्त है। यह पर्यावरण का ऐसा अंग है जिनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। स्वच्छ वायु में सांस लेकर ही हम स्वस्थ जीवन व्यतीत करते हैं। ऐसे में, जब वायु प्रदूषित हो जाती है तो मानव सांस लेते समय प्रदूषित हवा अपने भीतर लेता है जो उसके पूरे शरीर में फैल जाती है। ये प्रदूषित वायु मनुष्य के शरीर में विषैले पदार्थ पहुँचाती है जिनके कारण उसकी श्वास-प्रणाली प्रभावित होती है। फलस्वरूप, खाँसी, जुकाम से लेकर दमा जैसी बीमारियाँ उसे घेर लेती हैं। वायु प्रदूषण के कारण एलर्जी और दमा जैसी आम बीमारियों से लेकर कैंसर जैसी घातक बीमारी होने की संभावना होती है।

साथ ही प्रदूषित वायु मनुष्य की त्वचा को भी प्रभावित करती है। वर्तमान समय में जितनी ज्यादा मात्रा में त्वचा संबंधी रोग सामने आते हैं, उतने शायद ही पहले कभी आए हों। और यह तो स्वाभाविक ही है। हमारे शरीर में त्वचा ही वो भाग है, जो सबसे पहले वायु के संपर्क में आती है। ऐसे में यदि वह प्रदूषित वायु के संपर्क में आएगी, तो जाहिर तौर पर वायु प्रदूषण की परते हमारी त्वचा पर जमती जाएँगी और शीघ्र ही त्वचा संबंधी रोग के रूप में उभरेंगी।

फैक्ट्रियों और यातायात के साधनों से होने वाले धुएँ से न केवल सांस की बीमारियों का खतरा होता है, बल्कि ये पृथ्वी को बाहरी वातावरण से बचाने वाली ओजोन लेयर के लिए भी बहुत ही घातक सिद्ध हो रहे है। जाहिर है हमारे पर्यावरण को प्रभावित करने वाले ये हालात न केवल रोगों की संभावना प्रबल करते हैं, बल्कि हमारी पृथ्वी के लिए बहुत बड़ा खतरा बन चुके हैं।

समाधान


1. स्पष्टतः पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले दूषित धुएँ से बचने के लिए पर्यावरण के अनुकूल साधनों की खोज, विकास और प्रयोग आवश्यक है।
2. पेड़-पौधे वातारण से कार्बन डाइऑक्साइड खींचते हैं, और बदले में स्वच्छ ऑक्सीजन देते हैं। इसलिए बेहतर पर्यावरण के लिए वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करना चाहिए।

जल और स्वास्थ्य


यदि पृथ्वी का दो-तिहाई हिस्सा जल से व्याप्त है तो हमारे शरीर का भी एक बड़ा भाग जल-युक्त होता है। मानव शरीर का तकरीबन 66 प्रतिशत भाग जलीय है और, अपने शरीर में जल के स्तर को संतुलित रखने के लिए एक स्वस्थ मनुष्य को एक दिन में कम से कम 7 से 8 गिलास पानी पीना चाहिए। जाहिर है मानव शरीर के लिए जल बहुत ही महत्त्वपूर्ण तत्व है। हमारे द्वारा पिया गया पानी हमारे पूरे शरीर में पहुँचता है, और शरीर के प्रत्येक अंग में जल की आवश्कता को पूरी करता है।

जल के संबंध में एक और बात याद रखनी बहुत जरूरी है, और वह यह कि संसार के सारे तत्वों में जल ही सर्वाधिक घुलनशील पदार्थ है। ऐसे में वातावरण में मौजूद किसी भी तरह का हानिकारक पदार्थ बहुत ही आसानी से उसमें घुल जाता है। ऐसी परिस्थिति में अगर मनुष्य प्रदूषित पानी पीता है तो उसके शरीर के भीतर सारे अंगों में वह प्रदूषित पानी ही पहुँचता है। पिए गए पानी के साथ शरीर में पहुँचे जीवाणु और विषाणु सीधे हमारे गले और पेट को प्रभावित करते हैं। और गले के संक्रमण, फेफड़े की बीमारियों, आँत संबंधी रोगों के साथ-साथ पीलिया जैसे गंभीर रोगों की संभावनाएँ प्रबल हो जाती हैं।

साथ ही पर्यावरण संबंधी इन समस्याओं का प्रभाव मनुष्य के रक्त तक भी पहुँच जाता है और अक्सर रक्तजनित रोगों के रूप में उभरता है। रक्तप्रवाह के प्रभावित होने पर मनुष्य का रक्तचाप प्रभावित होता है, और फलस्वरूप, उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएँ सामने आती हैं। यही नहीं, इन सारी परिस्थितियों के कारण दिल की बीमारियों की संभावना भी प्रबल हो जाती है।

समाधान


1. जाहिर तौर पर पानी की सफाई बहुत ही आवश्यक है। इसलिए नदियों, तालाबों और कुएँ वगैरह की समय-समय पर नियमित रूप से सफाई करते रहना चाहिए।
2. पानी के स्रोतों में किसी भी तरह की गंदगी, कूड़ा वगैरह नहीं फेंकना चाहिए।
3. पीने के पानी से शौच आदि की नालियों को दूर रखना चाहिए।

ध्वनि और स्वास्थ्य


आधुनिक समाज में अति-विकसित औद्योगीकरण ने प्रकृति की स्वाभाविक शांति भी भंग कर दी है। आज के वातावरण में चिड़ियों की चहचहाहट, नदियों की कलकल, ठंडी हवा की आवाज, या पत्तियों की खड़खड़ाहट जैसी मधुरता वातावरण में मौजूद ध्वनि प्रदूषण के कारण दुर्लभ प्रतीत होने लगी है। औद्योगीकरण के शोर में जहाँ एक ओर प्राकृतिक आवाजें खो सी गई हैं, वहीं इस शोर ने मानव मन पर बहुत ही बुरा प्रभाव डाला है। परिणामस्वरूप आज के मनुष्य के मन में चिड़चिड़ापन, व्यथा और संताप बहुत ज्यादा बढ़ गए है। इसके कारण न केवल उसके स्वभाव में रूखापन और चिड़चिड़ाहट आई है, बल्कि उसके तनाव और थकान का स्तर भी बहुत ज्यादा बढ़ गया है। इन सारे हालातों में मनुष्य के संतप्त मन का सीधा प्रभाव उसके शरीर पर पड़ता है, और शरीर की सहनशक्ति कम होती जाती है। यही नहीं, इसके चलते मनुष्य की जीवन प्रत्याशा भी कम होती है।

घरेलू पर्यावरण और प्रदूषण


दूसरी ओर घर के भीतर का पर्यावरण भी मनुष्य के स्वास्थ्य को काफी गहराई से प्रभावित करता है। घरों में प्रयोग की जाने वाली बहुत-सी चीजें घरेलू पर्यावरण को प्रभावित करती हैं, जैसे

1. डिटरजेंट साबुन
2. पेंट, वार्निश
3. परफ्यूम, कॉस्मेटिक्स, शैम्पू
4. सिंथेटिक कपड़े कालीन
5. कीटनाशी दवाएँ
6. स्याही
7. सुगंधित पदार्थ
8. अनेक घुलनशील पदार्थ।

हालांकि यह आवश्यक नहीं कि इस सूची में दिए गए सारे पदार्थों का हमारे स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़े, लेकिन यह तो तय है, कि इसमें से ज्यादातर हमारे शरीर पर विपरीत प्रभाव ही डालते हैं। रोचक बात तो ये हैं, कि घरों में इस्तेमाल की जाने वाली रोजमर्रा की चीजों का दुष्प्रभाव हमारे शरीर पर अनजाने में ही पड़ता रहता है और कई बार हमें उन दुष्प्रभावों का अहसास भी नहीं होता। इस सूची में दिए गए पदार्थों का प्रयोग प्रत्येक घर में होता है। ऐसे में मान लीजिए कि घर में डिटरजेंट से सफाई की गई तो उस डिटरजेंट की महक पूरे घर में फैल जाती है, और हमारी नाक द्वारा हमारे शरीर में भी प्रवेश कर जाती है जो शरीर में घातक परिणाम छोड़ जाती है।

सामान्यतः इन पदार्थों के संपर्क में आने पर मनुष्य अपनी इंद्रियों द्वारा इन पदार्थों के हानिकारक रासायनिक तत्वों को आत्मसात कर लेता है, और इस तरह से शरीर में रोग के कीटाणुओं का प्रवेश होता है। यह जरूरी नहीं कि इन रोगाणुओं के कारण मानव शरीर किसी गंभीर रोग से ग्रस्त हो जाए, लेकिन कम से कम सामान्य चिड़चिड़ापन तो होता ही है।

सुगंध का स्वास्थ्य पर प्रभाव


हमारे आसपास अनेक प्रकार की सुगंध मौजूद रहती हैं जिनमें से कुछ तो हमारे जीन की जरूरत होती हैं, और कुछ का प्रयोग हम अपने शौक पूरे करने के लिए करते हैं, बिना इस बात पर ध्यान दिए कि इन पदार्थों का हमारे स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। जहाँ एक ओर कीटनाशक दवाओं जैसी चीजों का इस्तेमाल करना हमारी मजबूरी है, वहीं शौक के लिए प्रयोग किए जाने वाले परफ्यूम वगैरह भी हमारे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालते हैं। सुगंधित पदार्थों के कारण मानव शरीर पर होने वाले प्रभाव इस प्रकार हैं-

1. सिरदर्द और माइग्रेन
2. एलर्जी और द्रवीय निस्सारण
3. सांस उखड़ने की समस्या
4. दमा
5. जुकाम
6. त्वचा पर दाने और खुजली
7. एक्जिमा
8. उल्टी और मितली
9. सिर चकराना

दरअसल होता यह है कि इन सुगंधित पदार्थों के सूक्ष्म कण हवा में मौजूद होते हैं, और जब भी मानव शरीर इन सुगंधित पदार्थों के संपर्क में आता है, वह सांस द्वारा, या त्वचा, आंखों और श्लेश्मा झिल्लियों द्वारा इन पदार्थों की अपने भीतर अवशोषित कर लेता है। फलस्वरूप ये कण शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुँच जाते हैं और शरीर में रोग की संभावना बढ़ जाती हैं।

समाधान


अब ऐसे हालातों में प्रश्न ये उठता है, कि इन पदार्थों के दुष्प्रभावों से कैसे बचा जाए। क्या यह संभव है कि इन पदार्थों का प्रयोग ही पूरी तरह से बंद कर दिया जाए? सैद्धांतिक रूप से तो ऐसा किया जा सकता है लेकिन व्यवहार में संभवतः यह बुद्धिमत्तापूर्ण प्रतीत नहीं होता। इसलिए बेहतर तो यह होगा कि इस समस्या के ऐसे समाधान खोजे जाएं जो न केवल व्यावहारिक हों, बल्कि प्रकृति के नजदीक भी हों। जैसे

1. इन पदार्थों को बनाने में कम से कम रसायनों, और अधिक से अधिक प्राकृतिक घटकों का प्रयोग किया जाए
2. चूँकि एक जैसे अवयवों से बने हुए अनेक पदार्थों का एक साथ प्रयोग करने से उन अवयवों से होने वाले दुष्प्रभावों की संभावना कई गुना बढ़ जाती है, इसलिए कोशिश यह करनी चाहिए कि ऐसे नुकसानदेह पदार्थों का एक साथ प्रयोग कम से कम किया जाए।
3. घरों और भवनों का निर्माण इस तरह से किया जाना चाहिए कि उनमें बाहरी हवा का आवागमन भी अधिक से अधिक हो।
4. पेड़-पौधे पर्यावरण को स्वच्छ रखने के अचूक उपाय हैं। इसलिए घरों के भीतर और बाहर वृक्षारोपण को अधिकाधिक प्रोत्साहित करना चाहिए।

हालांकि यह जरूरी नहीं कि पर्यावरण को प्रभावित करने वाले उपर्युक्त कारकों का प्रभाव प्रत्येक मनुष्य पर समान रूप से हो, क्योंकि प्रत्येक मनुष्य की रोग-प्रतिरोधक क्षमता अलग-अलग होती है, लेकिन फिर भी लगातार संपर्क में आते रहने से ये हानिकाकरक पदार्थ हर किसी पर अपना कुछ न कुछ प्रभाव तो छोड़ ही जाते हैं। और परिणा सदैव एक ही होता है—रुग्ण मन और रूग्ण शरीर। हम जानते हैं कि स्वस्थ और सशक्त समाज के निर्माण के लिए स्वस्थ शरीर और संतुष्ट मन अनिवार्य है इसलिए मन और शरीर को रोगग्रस्त करने वाले इन हानिकारक पदार्थों को दूर करना ही हमारा प्रथम कर्तव्य होना चाहिए। केवल तभी हम एक शक्तिशाली और खुशहाल समाज की स्थापना कर सकेंगे।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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योजना, अप्रैल 2002

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